गाजीपुर के काव्य-साहित्य का इतिहास: साहित्यिक उपेक्षा से समावेशी इतिहास लेखन तक

स कविता को मूल सन्दर्भ से काटते हुए मैंने एक नए संदर्भ में देखा. एक अफ्रीकी कहावत है, Until the lions have their own historians, the history of the hunt will always glorify the hunter. नाइजीरियाई लेखक चिनुआ अचेबे ने इसे लोकप्रिय बनाया. जब तक शेरों के अपने इतिहासकार नहीं होंगे, शिकार की कहानी हमेशा शिकारी की ही महिमा गायेगी. यह कहावत इतिहास लेखन में सत्ता, उपनिवेशवाद और विजेताओं के प्रभुत्व की आलोचना करती है। 

इतिहास राजनीतिज्ञों के लिए इतना महत्वपूर्ण है कि उनके अपने इतिहासकार होते हैं, सत्ता, उपनिवेशवाद और विजेता इतिहास लिखते हैं। सत्ता जब बदलती है तब इतिहास का पुनर्मूल्यांकन और पुनर्लेखन होता है। एक सीमा तक यह आवश्यक भी है ताकि पिछली गलतियों और पूर्वग्रहों को दुरुस्त किया जा सके। यह प्रक्रिया समाज के मानसिक पुनर्गठन के लिए बेहद जरूरी है। 

लेकिन साहित्य के इतिहास का राजनीति से क्या लेना देना? क्या साहित्य के इतिहास में भी ये कमियाँ आती हैं? अनुभवजन्य निष्कर्ष है कि, बिल्कुल आती हैं। साहित्य में राजनीति और मठाधीशी से आखिर कौन इन्कार कर सकता है? कभी-कभी सेंसरशिप के रूप में राजसत्ता और सामाजिक समूह रचना के वर्तमान और भविष्य को तय करने लगते हैं. तेलुगु साहित्य में इसका एक उदाहरण है: मुद्दुपलानी का काव्य ग्रन्थ: राधिका सान्त्वनम। बीसवीं सदी में इसके प्रकाशन के बाद तेलुगु समाज में एक तूफ़ान उठ खड़ा हुआ, अलग-२ कारणों से उस पर अनेक बार प्रतिबंध लगे और अनेक बार प्रतिबंध हटाये गए। 

बीसवीं सदी में तेलुगु के प्रसिद्ध कवि वरवर राव की काव्यकृति भविष्यचित्रपटम पर एन.टी. रामाराव की सरकार ने पाबन्दी लगाई और कवि को अनेक प्रकार से प्रताड़ित किया गया। और तो और, मैक्सिम गोर्की जैसे महान लेखक को पार्टी साहित्य लिखने के लिए प्रताड़ित किया जाना किसी से छिपा नहीं है। महान दार्शनिक कांट को अपनी दार्शनिक रचनाओं के लिये राजा से संवाद स्थापित कर अपनी भाषा को बदलना पड़ा और उन्हें आश्वस्त करना पड़ा कि ये रचनाएँ राजा के विरुद्ध नहीं हैं। इत्यादि इत्यादि। 

जाहिर है कि सत्ताएं और विचारधाराएँ साहित्य को ही नहीं, साहित्य के इतिहास को भी प्रभावित करती हैं। कुछ इतिहासकार कुछ कवियों और लेखकों को महत्त्व देते हैं और कुछ को महत्त्व नहीं देते; बल्कि अधिकांश का तो उल्लेख भी नहीं करते। वे जिन कवियों और लेखकों को पसन्द करते हैं, उन पर विस्तार से लिखते हैं; और जिनको पसन्द नहीं करते, उनका केवल नामोल्लेख करते हैं या वह भी नहीं करते।

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