गुमला का महामाया मंदिर
गुमला जिला मुख्यालय से से 30 किमी और घाघरा प्रखंड से आठ किमी दूर अवस्थित है हापामुनी गांव। यहां अति प्राचीन महामाया मंदिर है। महामाया माँ को मंजूषा में बंद करके रखा जाता है। मां को खुले आँख से देखने की परंपरा नहीं है। मंदिर के बाहर में मां महामाया की एक दूसरी प्रतिमा स्थापित की गयी है। भक्तजन उसी की पूजा-अर्चना करते हैं। महामाया मंदिर एक तांत्रिक पीठ भी है। इस मंदिर की स्थापना विक्रम संवत 965 यानी 908 ई में महाराजा मोहन राय के बेटे गजघंट द्वारा की गई थी। वे नागवंश के 22 वें राजा थे। उन्होंने 869 से 905 ई के बीच शासन किया उन्होंने मंदिर की देखभाल अपने गुरु हरिनाथ, एक मराठी ब्राह्मण को सौंप दी थी। इस मंदिर से लरका आंदोलन का भी इतिहास जुड़ा हुआ है। 1831 में लरका आन्दोलन (कोल विद्रोह) के समय इस क्षेत्र के दो आदिवासियों के बीच लड़ाई के दौरान इसे बर्बाद कर दिया गया था।
दुमका का मौलिक्षा मंदिर
दुमका जिले में शिकारीपाड़ा के पास बसे गांव मलूटी को गुप्त काशी कहा जाता है। यहां पर मौलिक्षा माता का मंदिर है। यहां माँ के मस्तक के ही दर्शन किये जा सकते हैं। मंदिर के भीतर गर्भगृह एवं ऊँचे चबूतरा पर मां की सौम्य भव्य प्रतिमा स्थापित है। मां मौलिक्षा, मां तारा की बड़ी बहन के रूप में जानी जाती हैं। यद्यपि मां मौलिक्षा की पूजा देवी दुर्गा के सिंहवाहिनी के रूप में की जाती है। इस छोटे से गांव मलूटी में हर तरफ सिर्फ प्राचीन मंदिर ही मंदिर नजर आते हैं। यहां दुर्गा के अतिरिक्त भगवान शंकर, काली, धर्मराज, मनसा, विष्णु आदि देवी-देवताओं के भी मंदिर हैं। टेराकोटा शैली में बने मलूटी के मंदिरों की यह खासियत है कि ये अलग-अलग समूहों में निर्मित हैं। इन मंदिरों का निर्माण 1720 से लेकर 1840 के मध्य हुआ था। पूर्व में मलूटी का नाम मल्लहारी था, जो बाद में मलूटी हो गया। मंदिरों के इस गांव को एक ही स्थान पर मंदिर, मस्ज़िद और गिरजाघर होने का भी सौभाग्य प्राप्त है।