रामगढ़ का मां छिन्नमस्तिका मंदिर
रांची से करीब 80 किमी दूर रामगढ़ के रजरप्पा में स्थित मां छिन्नमस्तिका मंदिर एक बड़े शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है। भैरवी, भेड़ा और दामोदर नदी के संगम पर स्थित यह पीठ तंत्र साधना का बड़ा केंद्र है। कहा जाता है कि दस महाविद्याओं की सिद्धि हासिल करने के लिए साधकों को यहां आना पड़ता है। क्योकि दस महाविद्याओं में पांचवीं मां छिन्नमस्तिके ही हैं। छिन्नमस्तिका मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए जाना जाता है। पूरा मंदिर श्रीयंत्र का आकार लिए हुए है। गर्भगृह में मां छिन्नमस्तिका एक हाथ में खड्ग और दूसरे में खड्ग से कटा अपना सर थामे विराजती हैं। शारदीय दुर्गा उत्सव में महानवमी की पूजा सबसे पहले संताल आदिवासी द्वारा की जाती है। उन्हीं के द्वारा प्रथम बकरे की बलि देने की भी परंपरा है। इसके निर्माण काल को लेकर पुरातात्विक विशेषज्ञों में मतभेद है। किसी के अनुसार इसका निर्माण छह हजार वर्ष पहले हुआ था तो कोई इसे महाभारत युग का मानता है।
रांची-टाटा मार्ग का दिउड़ी मंदिर
रांची-टाटा रोड पर तमाड़ से तीन किमी दूर स्थित है प्राचीन दिउड़ी मंदिर। यह दो एकड़ में फैला है। यहां सोलहभुजी मां दुर्गा विराजती हैं। मां की प्रतिमा साढ़े तीन फीट ऊंची है। प्रतिमा के दाहिने हाथ में तलवार, बाण, डमरू, गदा, शंख, त्रिशूल है। बाएं चार हाथ में धनुष, ढाल, परम पुष्प है। स मंदिर को आदिवासी और हिन्दू संस्कृति का संगम कहा जाता है। इस मंदिर के पुजारी मुंडा पाहन होते हैं। पाहन और ब्राह्मण दोनों पूजा कराते हैं। इस मंदिर की स्थापना पूर्व मध्यकाल में तकरीबन 1300 ई. में सिंहभूम के मुंडा राजा केरा ने की थी। कहा जाता है कि सम्राट अशोक इस देवी के दर्शन के लिए आते थे। इस मंदिर में स्थापित देवी मां की मूर्ति ओड़िसा की मूर्ति शैली जैसी है। इस मंदिर को बनाने में पत्थरों को काट कर बिना जोड़े हुए एक दूसरे के ऊपर रखा गया है। कहा जाता है की यहां कोई भी खुद से नहीं पहुँचता देवी स्वयं ही सभी को बुलाती हैं।
लातेहार का उग्रतारा मंदिर
लातेहार के चंदवा प्रखंड के नगर गाँव स्थित मां उग्रतारा मंदिर में दुर्गा पूजा का पर्व बड़ी धूम-धाम से मनाया जाता है। यहां सोलह दिनों की नवरात्र साधना होती है। कैथी भाषा में लिखे पांच सौ वर्ष पुरानी पोथी का अनुसरण करते हुए पूजा अनुष्ठान कराया जाता है। मंदिर के मुख्य प्रकोष्ठ में उग्रतारा की छोटी-छोटी मूर्तियां हैं, जो हमेशा वस्त्राच्छादित रहती हैं। श्वेत प्रस्तर से निर्मित मूर्तियों को शिल्प की दृष्टि से दक्षिणोत्तर शैली का सम्मिश्रण माना जाता है। मंदिर के प्रांगण में कुछ बौद्धकालीन प्रतिमाएं भी हैं। मुस्लिम समाज के लोग भी यहां पूजा अर्चना कर मन्नत मांगने आते हैं। मंदिर के पश्चिमी भाग में स्थित मंदारगिरी पर्वत पर मदार साहब का मजार है। मंदिर के निर्माण के संबंध में ‘पलामू विवरणिका 1961’ में लिखा गया है कि मंदिर बनवाने का श्रेय प्रसिद्घ वीर मराठा रानी अहिल्याबाई को है। यहाँ दूर-दूर से लोग मां के दर्शन के लिए आते हैं।