गोड्डा का मां योगिनी मंदिर

चतरा का मां भद्रकाली मंदिर

चतरा के इटखोरी प्रखंड मुख्यालय से करीब डेढ़ किमी दूर स्थित भदुली गांव में मां भद्रकाली मंदिर स्थित है। कमल के आसन पर मां भद्रकाली की आदमकद प्रतिमा वरदायिनी मुद्रा में है। मां की चतुर्भुज प्रतिमा करीब साढ़े चार पीठ ऊंची और ढाई पीठ चौड़ी है। प्रतिमा के चरणों के नीचे ब्राह्मी लिपि में लिखा है कि इसका निर्माण नौवीं शताब्दी में राजा महेंद्र पाल द्वितीय ने कराया था। मंदिर का प्रांगण 196 एकड़ में है जिसमें एक विशाल यज्ञशाला का निर्माण कराया गया है। यज्ञशाला ले पूरब में एक संग्रहालय है जिसमें मंदिर परिसर से प्राप्त मूर्तियां और भग्नावशेष सुरक्षित हैं। बौद्ध धर्म के लोग प्रतिमा को मां तारा के रूप में पूजते हैं। तंत्र साधना के लिए मां तारा की एक मूर्ति कुछ इस प्रकार निर्मित है कि मां के पैर का अंगूठा साधक के ठीक आज्ञाचक्र के समक्ष दिखता है। मंदिर परिसर में एक अनूठा बौद्ध स्तूप स्थापित है।

गोड्डा का मां योगिनी मंदिर

गोड्डा जिले के पथरगामा प्रखंड में स्थित मां योगिनी मंदिर तंत्र साधना के लिए प्रसिद्ध है। कामख्या मंदिर की तरह यहां भी पिंड की पूजा होती है। मां योगिनी मंदिर के ठीक बाईं ओर से 354 सीढ़ी ऊपर चढ़ने पर मां का गर्भगृह मिलता है। गर्भगृह के अंदर जाने के लिए एक गुफा से होकर गुजरना पड़ता है। इसे बाहर से देखकर अंदर जाने की हिम्मत नहीं होती, क्योंकि इसमें पूरी तरह अंधेरा होता है। लेकिन जैसे ही आप गुफा के अंदर प्रवेश करते हैं, आपको प्रकाश नजर आता है, जबकि यहां बिजली की व्यवस्था नहीं है। मंदिर के सामने एक बट वृक्ष है। प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इस बट वृक्ष पर बैठकर साधक साधना किया करते थे और सिद्धि प्राप्त करते थे। ऐतिहासिक एवं धार्मिक ग्रंथों के अनुसार यहां पांडवों ने अपने अज्ञात वर्ष के कई दिन बिताए थे। तब यह मंदिर ‘गुप्त योगिनी’ के नाम से प्रसिद्ध था। पहले यहां नर बलि दी जाती थी। लेकिन अंग्रेजों के शासनकाल में इसे बंद करवा दिया गया। 

गढ़वा की गढ़देवी

गढ़वा महाराजा की अधिष्ठात्री कुल देवी हैं गढ़देवी। मंदिर उनके गढ़ के प्रांगण में स्थित है। 1915 के सर्वे में इस मंदिर का प्रमाण मिलता है। गढ़ के महाराज द्वारा इस मंदिर का निर्माण करा देवी की प्रतिमा स्थापित की गयी थी। वर्ष 1914 में गढ़वा के जमींदार सह गढ़ के राजा बाबू अमरदयाल सिंह द्वारा पहली बार पुत्र की कामना को लेकर बंगाली पद्धति से मां गढ़देवी मंदिर में पूजा की गई थी। पूजा करने के बाद उन्हें पुत्र की प्राप्ति भी हुई। इस मंदिर के नाम पर शहर का नामकरण गढ़वा हुआ। यहाँ झारखण्ड, बिहार एवं यूपी के श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। मां के प्रति अपार श्रद्धा है। भक्तों की हर मनोकामना मां पूर्ण करती हैं। नवरात्रि में भक्तों की काफी भीड़ होती है। नवरात्रि के दौरान मंदिर में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित कर पूजा अर्चना की जाती है। विसर्जन के लिए मां दुर्गा की प्रतिमा को कंधे पर ले जाने की परम्परा है। 

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