बाबा कार्तिक उरांव : एक जीवन, एक विचार और एक अधूरे सपने को साकार करने का संकल्प

डॉ. अरुण कुमार उरांव, पूर्व आईपीएस संस्थापक एवं संरक्षक — कार्तिक उरांव रात्रि पाठशाला 

एक व्यक्ति नहीं, एक युगदृष्टा इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जिनका जीवन उनके जन्म और मृत्यु की तिथियों के बीच सीमित नहीं रहता। वे अपने विचारों, संघर्षों और समाज के प्रति समर्पण के कारण आने वाली अनेक पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बन जाते हैं। 

बाबा कार्तिक उरांव ऐसे ही एक असाधारण व्यक्तित्व थे। वे केवल एक राजनेता नहीं थे। वे एक दूरदर्शी अभियंता, उच्चकोटि के शिक्षाविद्, प्रखर चिंतक, आदिवासी अस्मिता के सजग प्रहरी और सबसे बढ़कर समाज के अंतिम व्यक्ति की पीड़ा को समझने वाले संवेदनशील इंसान थे। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि गरीबी और अभाव किसी व्यक्ति की प्रतिभा को रोक नहीं सकते, यदि उसके भीतर दृढ़ संकल्प, अनुशासन और आगे बढ़ने की अदम्य इच्छाशक्ति हो। 

29 अक्टूबर 2026 को उनकी 102वीं जयंती के अवसर पर हमें केवल उनके व्यक्तित्व का स्मरण नहीं करना चाहिए, बल्कि गंभीरता से आत्मचिंतन भी करना चाहिए कि जिस समाज के उत्थान के लिए उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन समर्पित किया, आज वह समाज कहाँ खड़ा है और उनके सपनों को साकार करने के लिए हम क्या कर रहे हैं। 

1. एक साधारण आदिवासी परिवार से असाधारण ऊँचाइयों तक 

बाबा कार्तिक उरांव का जन्म 29 अक्टूबर 1924 को तत्कालीन बिहार, वर्तमान झारखंड के गुमला जिले के करौंदा लिटाटोली गाँव में एक साधारण उरांव आदिवासी परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम जैरा उरांव और माता का नाम बिरसी उरांव था। उनका बचपन ग्रामीण परिवेश में बीता, जहाँ सीमित संसाधन, आर्थिक कठिनाइयाँ और शिक्षा के अपर्याप्त अवसर जीवन की वास्तविकताएँ थीं। 

लेकिन बालक कार्तिक की आँखों में कुछ अलग करने का सपना था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गुमला में हुई। इसके बाद उन्होंने पटना साइंस कॉलेज में अध्ययन किया और बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, पटना से अभियंत्रण की शिक्षा प्राप्त की। उस समय किसी सुदूर आदिवासी गाँव के युवक का उच्च शिक्षा के लिए पटना पहुँचना ही एक बड़ी उपलब्धि थी। लेकिन कार्तिक उरांव की यात्रा यहीं समाप्त नहीं हुई। उन्होंने उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए इंग्लैंड का रुख किया। वहाँ उन्होंने इंजीनियरिंग के विभिन्न क्षेत्रों में उच्च अध्ययन किया और अनेक तकनीकी योग्यताएँ अर्जित कीं। उनकी नौ उच्च शैक्षणिक एवं तकनीकी योग्यताओं का उल्लेख आज भी बड़े गर्व के साथ किया जाता है। उन्होंने ब्रिटेन में प्रतिष्ठित तकनीकी परियोजनाओं पर कार्य किया। परमाणु ऊर्जा संयंत्र से संबंधित इंजीनियरिंग कार्यों में उनकी भागीदारी उनकी असाधारण प्रतिभा का परिचायक थी। 

कल्पना कीजिए—गुमला के एक छोटे से गाँव का वह बालक, जिसने कभी संसाधनों के अभाव में अपनी शिक्षा प्रारंभ की थी, एक दिन विश्वस्तरीय इंजीनियरिंग परियोजनाओं का हिस्सा बन गया। यह केवल व्यक्तिगत सफलता की कहानी नहीं थी। यह संपूर्ण आदिवासी समाज की बौद्धिक क्षमता का विश्व के सामने प्रमाण था। विदेश की उपलब्धियाँ, लेकिन मन अपनी मिट्टी में बाबा चाहते तो विदेश में एक प्रतिष्ठित अभियंता के रूप में सुख-सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन व्यतीत कर सकते थे। लेकिन उनकी आत्मा अपनी जन्मभूमि, अपने लोगों और अपनी संस्कृति से जुड़ी हुई थी। 

वे भारत लौट आए और रांची स्थित हेवी इंजीनियरिंग कॉरपोरेशन में उच्च तकनीकी पद पर कार्य करने लगे। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। एक ओर सुरक्षित और सम्मानजनक पेशेवर भविष्य था, तो दूसरी ओर अपने समाज की गरीबी, अशिक्षा, शोषण और उपेक्षा की चुनौती। उन्होंने दूसरा रास्ता चुना। यह निर्णय केवल पेशा बदलने का नहीं था। यह व्यक्तिगत उपलब्धियों से ऊपर उठकर सामूहिक उत्तरदायित्व स्वीकार करने का निर्णय था। 

2. राजनीति उनके लिए सत्ता नहीं, समाज सेवा का माध्यम थी 

बाबा कार्तिक उरांव ने राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति का साधन नहीं बनाया। उनके लिए राजनीति समाज की आवाज को राष्ट्रीय मंच तक पहुँचाने का माध्यम थी। वे 1967, 1971 और 1980 में लोहरदगा संसदीय क्षेत्र से लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। उन्होंने बिहार विधानसभा में भी प्रतिनिधित्व किया तथा भारत सरकार में नागरिक उड्डयन एवं संचार से संबंधित मंत्री पद का दायित्व संभाला। लेकिन इन पदों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण था उनका सामाजिक दृष्टिकोण। वे जानते थे कि आदिवासी समाज की समस्याएँ केवल आर्थिक नहीं हैं। इनका संबंध शिक्षा, भूमि, संस्कृति, पहचान, संवैधानिक अधिकारों, सामाजिक सम्मान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व से भी है। 

उन्होंने संसद में आदिवासी समाज के अधिकारों और संवैधानिक संरक्षण से जुड़े विषयों को दृढ़ता से उठाया। आदिवासी पहचान तथा आरक्षण के संबंध में उनके कुछ विचार उस समय भी व्यापक बहस का विषय थे और आज भी उन पर विभिन्न दृष्टिकोण मौजूद हैं। लेकिन उनके सार्वजनिक जीवन की एक केंद्रीय चिंता निर्विवाद रूप से महत्वपूर्ण थी—आदिवासी समाज अपनी पहचान, अधिकार और सम्मान के साथ विकास की मुख्यधारा में आगे बढ़े। उन्होंने अखिल भारतीय आदिवासी 

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