फिल्म में क्या है खास?
फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका अनोखा आइडिया है. पुराने फोन के जरिए दो अलग-अलग समय में रहने वाले लोगों का जुड़ना कहानी को दिलचस्प बनाता है. शुरुआत में फिल्म दर्शकों के मन में कई सवाल पैदा करती है और आगे क्या होगा, यह जानने की उत्सुकता बनी रहती है.
फिल्म के डायरेक्टर करण रावल ने टाइम ट्रैवल की कहानी को अलग अंदाज में पेश करने की कोशिश की है. पहले हाफ में किरदार धीरे-धीरे इस अनोखी स्थिति को समझते हैं, जिससे कहानी में रोमांच बना रहता है.
हालांकि, फिल्म में टाइम ट्रैवल से जुड़े हर सवाल का जवाब तर्क के आधार पर तलाशना सही नहीं होगा. यह एक कमर्शियल फिल्म है, इसलिए इसमें कुछ सिनेमाई छूट भी ली गई है. असली परेशानी तब शुरू होती है, जब कहानी जरूरत से ज्यादा पेचीदा होने लगती है.
दूसरे हाफ में उलझ जाती है कहानी
फिल्म का दूसरा हिस्सा कई सवालों के जवाब देने की कोशिश करता है. साल 2016 और 2026 की घटनाओं को जोड़कर कहानी को आगे बढ़ाया जाता है. लेकिन जब दोनों समय की घटनाएं एक-दूसरे से टकराने लगती हैं, तो कहानी को समझना मुश्किल हो जाता है.
एक समय के बाद दर्शकों के लिए यह समझना चुनौती बन जाता है कि कौन-सी घटना कब और कैसे हो रही है. फिल्म का क्लाइमैक्स भी जरूरत से ज्यादा खिंचा हुआ लगता है. कहानी को दिलचस्प बनाने की कोशिश में इसे इतना उलझा दिया गया है कि इसका असर फिल्म के मजे पर पड़ता है.